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दिल्ली विश्वविद्यालय में अब पढ़ाई जाएगी जाति-व्यवस्था और मनुस्मृति, संस्कृत पाठ्यक्रम में नया बदलाव

दिल्ली विश्वविद्यालय में अब पढ़ाई जाएगी जाति-व्यवस्था और मनुस्मृति, संस्कृत पाठ्यक्रम में नया बदलाव

नई दिल्ली – दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) में संस्कृत विषय से ग्रेजुएशन कर रहे छात्रों को अब जाति और वर्ण व्यवस्था, विवाह की सामाजिक भूमिका और नैतिकता के महत्व जैसे विषय पढ़ाए जाएंगे। यह शिक्षण एक नए पाठ्यक्रम “धर्मशास्त्र अध्ययन” (Study of Dharmashastra) के अंतर्गत होगा, जिसमें प्राचीन हिंदू ग्रंथ मनुस्मृति का एक चैप्टर भी शामिल किया गया है।

क्या है नया पाठ्यक्रम?

धर्मशास्त्र अध्ययन पाठ्यक्रम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि छात्र यह समझ सकें कि किस प्रकार से प्राचीन शास्त्रों ने समाज को संगठित किया था। इसमें वर्ण व्यवस्था को सामाजिक संगठन की एक पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया गया है, और विवाह को एक ‘सभ्य सामाजिक व्यवस्था’ स्थापित करने का माध्यम बताया गया है। पाठ्यक्रम में नैतिकता के आयाम भी शामिल हैं, जिससे यह समझाया जाएगा कि व्यक्ति का व्यक्तिगत आचरण किस प्रकार समाज पर प्रभाव डालता है।

मनुस्मृति की वापसी:

यह उल्लेखनीय है कि मनुस्मृति को पहले “लॉ एंड जस्टिस इन द संस्कृत ट्रेडिशन” जैसे पाठ्यक्रमों में शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन भारी विरोध के चलते प्रशासन को वह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। इस बार, इसे एक अनुशासन-विशिष्ट (discipline-specific) पाठ्यक्रम में अनिवार्य अध्याय के रूप में शामिल किया गया है, जिससे इसकी पढ़ाई संस्कृत विषय के छात्रों के लिए अनिवार्य हो गई है।

विवाद की संभावना फिर से:

मनुस्मृति को लेकर पहले भी तमाम विश्वविद्यालयों और सामाजिक संगठनों में बहस और विरोध हुआ है। इस ग्रंथ में वर्ण व्यवस्था के समर्थन और महिलाओं को लेकर किए गए कई विवादास्पद उल्लेखों के कारण इसे अक्सर आलोचना का सामना करना पड़ा है। ऐसे में DU में इसकी वापसी एक बार फिर सामाजिक और अकादमिक बहस को जन्म दे सकती है।

DU प्रशासन का पक्ष:

DU प्रशासन का कहना है कि यह कदम छात्रों को भारतीय परंपरा और धर्मशास्त्रों की ऐतिहासिक समझ देने के उद्देश्य से उठाया गया है। प्रशासन के मुताबिक, छात्रों को केवल शास्त्रीय ज्ञान ही नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं के विकास को समझने का अवसर भी मिलेगा।

छात्रों की प्रतिक्रिया:

कुछ छात्रों और शिक्षकों ने पाठ्यक्रम के शैक्षणिक दृष्टिकोण को सकारात्मक बताया है, लेकिन कई छात्र संगठन इस कदम पर सवाल उठाने की तैयारी में हैं, खासकर मनुस्मृति की अनिवार्य उपस्थिति को लेकर।

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